कहाँ जरूरी था इस तरह बेइंतहा तकलीफ देना
कहाँ जरूरी था मेरे दिल का कत्ल करना,
यह तो तुम्हारा ही था मैंने कहाँ तुमसे इसकी कीमत मांगी थी.
रहने ही देते तुम इस मासूम का भरम हमेशा
कहाँ हमने तुमसे कभी कोई कसम मांगी थी
निभा लेंगे हम अकेले ही अपने हिस्से की वफ़ा
हमने कब देखा स्नेह में नुकसान या नफा
कहाँ जरूरी था नाजुक रिश्ते को जानलेवा तपिश में झोंकना
कहाँ जरूरी था शीतल धारा को तपती रेत में फेंकना
यह तो तुम्हारे खयालों में ही खुश थी
मैंने कहाँ तुमसे तुम्हारी जागीर मांगी थी......
सरोज यादव सरु
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