किसे नही होगा प्यार पिता की उस हस्ती से
जिसने आसमान सी विशालता
सागर सी गहराई पहाड़ सी अडिगता
समेट रखी अपने अकेले व्यक्तित्व में
जिसके सपाट चेहरे से
पता भी नही चला भोली संतान को
कितना उथल पुथल चलता है
इस महामानव सर्वसमर्थ के जीवन मे
जिसने महारत हासिल कर रखी है
सारे तूफ़ान खुदपर ले लेने की
जिसने कसम खा रखी है
दुनिया का हर वार खुदपर लेने की
जिसने महसूस ही नही होने दिया अभाव है क्या
जिसने सोचने ही नही दिया हाय अब हम करें क्या
जिसकी क्षमता से आश्चर्यचकित मुश्किल हिम्मत हारती है
जिसके धैर्य से नत मस्तक हो कठिनाई आरती उतारती है
जिसके हिमालय से चट्टानी व्यक्तित्व के भीतर प्यार की गंगा हिलोर मारती है
जीवन के महाभारत के युध्द की मुश्किलें पिता से हारती हैं
क्योंकि परिवार रूपी रथ का पिता ही निपुड़ सारथी है
सरोज यादव सरु
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