कहने को तो सारे अपने है
हाँ,वक्त पे कोई नही आता
कितनी राहें बिखरी फिर भी
खुशियों तक एक नही जाता
जब उन्हें जरूरत मेरी हो
वो मेरा ठिकाना जाने हैं
मेरे दर्द में डूबी कश्ती से
लेकिन कहते अनजाने हैं
हम जान के भी अनजान बने
कुछ आदत अपनी ऐसी है
लेकिन उनकी नजरों में दिखे
मेरी कीमत क्या है कैसी है
हम खुद को बदल नही सकते
वो दर्द का तोहफा ही देंगे
हम उनको कैसे निराश करें
वो जो भी दें हम ले लेंगे
मेरा जीवन दर्द का सौदागर
जीवन भर यह व्यापार रहा
खुशियां बांटी है अपनो को
अपने लिए गम का हार रहा
है सुख की बात यही मेरे
मेरे हाथ से कांटे नही बिछे
मौसम चाहे जैसा भी आये
इन हाथों से बस फूल बिछे
कुछ सोचा होगा दाता ने
कोई बात तो यूँ बेकार नही
तय करके सब वह रखता है
चलता यूँ ही संसार नही
हर बाधा पार कराता तू
आगे भी हिम्मत देना तू
तेरा दिया सभी मंजूर मुझे
बस सर पर छाया रखना तू
दुख के बदले ना दुख दूँ मैं
मेरे मन को निर्मल रखना तू
जब भी मन विचलित हो मेरा
मेरे अंतस में प्रभु बसना तू
सरोज यादव सरु
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