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गंगा माँ बहती रहती हो पापों को धोती रहती हो

                
                                                         
                            गंगा माँ बहती रहती हो पापों को धोती रहती हो
                                                                 
                            
तुम्हे धुमिल सब कर देते हैं नही मगर कुछ तुम कहती हो
पापी के पाप जो बह जाते हैं कहीं किनारे लग जाते हैं
सागर तक अकुला जाता है लौट के फिर से आजाते है
माँ हो तुम कल्याण करोगी मगर सजा क्या तुम न दोगी
कभी तो कुछ प्रतिकार करो माँ गलती को स्वीकार करो माँ
बंद करो पापी लोगों के पाप हटाने का अभियान
पापी को बस सजा मिले यही करो अब काम महान.....

सरोज यादव""सरु""

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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