जतन करो कोई कि लब पे तबस्सुम आये
बड़ी उदास सी दिखती फ़िजा जमाने से
असर जरूर हुआ है तुम्हारे आने का
कितना कुछ बदला है एक तेरे मुस्कराने से
एक हंसी क्यो नही देते मुझे खजाने से.
आज दुनिया मे जिसे देखिए अकेला है
जिसे भी अपना कहो स्वार्थ का झमेला है
सिर्फ एक चाह को विशाल वृक्ष बनने दे
कुछ अलग क्यों नही करते भला जमाने से
एक हंसी क्यो नही देते मुझे खजाने से.
कुछ तो बदला है अलग रंग है फ़िज़ाओं पर एक बिजली सी तड़प उठती है घटाओं पर
फूल से खुशबू लिए झूमती बलखाती पवन
तुमको देखें लगे देखा नही जमाने से
एक हंसी क्यो नही देते मुझे खजाने से.
जब नही आये थे कुछ और थी मेरी उलझन
पास हो तुम तो क्यों शोर मचाये धड़कन
जाने किस रंग में रंग जाए मेरा साधु मन
एक शिक़वा भी नही आज है जमाने से
एक हंसी क्यो नही देते मुझे खजाने से.
बड़े मशरूफ़ रहा करते हो मैंने माना
वक्त का फूल मुझे आज तो देते जाना
तुम्हारे हाथ तो खाली नही हैं इतने भी
मेरी खुशियां भी चली जाए तेरे जाने से
एक हंसी क्यो नही देते मुझे खजाने से.
सरोज""सरु""
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