एक गिलहरी मेरे छत पर आती है हर शाम
घूमती रहती इधर उधर जैसे निपटाए काम
शीशे की कंचे सी आंखे दूध से उजले दांत
मन मेरा ललचाता कर लेती वो मुझसे बात
उसके कोमल बालों को सहला दूँ मैं जी चाहे
लेकिन थोड़ी सी आहट पर रुके भला वो काहें
हमने रिश्ता कहाँ निभाया इन जीवों से वैसा
गए वक्त में लोग पुराने निभा सके थे जैसा
यही गिलहरी राम के हाथों स्पर्श पुण्य सा पाया
आज हमारे हाथों ने तो छीन ली सर से छाया
हम अपराधी हो बैठे है अपने दुश्मन बन बैठे है
सांसो पे आरी चलती है नासमझी में हम ऐंठे है
खुद मिटने की राह जोहते रही नही है माया
आज गिलहरी घूम रही कल दिखे न शायद काया
रस्म निभाएं शोर मचाये इससे आखिर होगा क्या
उजड़ चुकी सूखी धरती का हरा ये दामन होगा क्या
कंकड़ के जंगल सीमित कर नया जुगत कोई खोज के लाये
सुना हुआ आँचल धरती का फिर फूलों से सज लहराए
सरोज यादव सरु
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