आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चलना ही प्रकृति का नियम है...

                
                                                         
                            चलना चाहिए चलना ही प्रकृति का नियम है,
                                                                 
                            
भले ही चलने में कभी जान बूझकर ठोकर खाएं.
ठोकर भी शिक्षक है,मौन रह ज्ञान देता है .
सिखाता है हमारी कमियों को दूर करना,
दिखाता है दुनिया की चालाकियां.
जरूरी है अपनी दुनिया से बाहर आकर ठोकर खाना,
ठोकर भी एक शिक्षक है ,
सिखाता है जरूरी नही तुम बहुत अच्छे रहो,
बेच कर अपना आत्मसम्मान .
जरूरी है पहचान करना अपने स्व की,
और बढ़ जाना आगे अपने सम्मान की खातिर,
भले ही कभी कभी करे मन कातर प्रार्थना,
मगर प्रार्थना सुन कर कमजोर होना ठोकर का अपमान होगा.
क्योंकि ठोकर शिक्षक है सिखाता है कल स्वयं को जवाब देना

-सरोज सरु

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।

 
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर