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आंखों की ये अजब पहेली

                
                                                         
                            आंखों की ये अजब पहेली
                                                                 
                            
आखिर किसकी है ये सहेली

खुशियां हों तो आंखे बरसे,
गम से मिलन हो आंखे बरसे,

इनको समझे ये मन कैसे,
इनके मन के भाव हैं ऐसे

दूध में मिलता पानी जैसे
दिल से ये मिलती हैं ऐसे

कुछ भी इनसे छुप न पाएं
मन का ये दर्पण कहलाये

खुशियों में ये दीप जलाए
दुख में ये बदली बन जाये

आंखों में सब राज समाए
सबके मन को ये पढ़ पाए

जब भी दिल को दर्द सताये
आंसू बन मरहम लग जाए

जब भी उनकी याद सताये
सपनों में उन्हें ये लेकर आये

भले न समझूँ इनकी पहेली
लेकिन यही है मेरी सहेली

सरोज यादव सरु

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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