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अचंभित कर रहा था वह दृश्य

Achambhit Kar Raha Tha Wah Drishya
                
                                                         
                            अचंभित कर रहा था वह दृश्य
                                                                 
                            
जहां रौशनी का मिलन हो रहा था
कभी कभी ही तो दिखता है
एक साथ उगता और डूबता
दिन का सूर्य और रात का चांद
टकटकी बांधे देखते हैं दोनो
वर्षों से एक दूसरे से बिछड़े
चिर प्रेमियों की तरह
जी लेना चाहते हों जैसे दोनो ही
इसी एक पल में
बीते और आने वाले जीवन को
मेरा बस चले मैं रोक दूँ समय को
न सहन करना पड़े इनको वही पीड़ा
तुमसे बिछड़ के जिसे मैं सहती हूँ
मेरा बस चले तो मैं बदल दूँ
उस नियम को भी हमेशा के लिए
जहाँ मिलने के बाद बिछड़ना
सदियों से आवश्यक रहा है
और शायद तब नही करेगा अचंभित
दो रौशनी का यूँ मिलना कभी कभी...

सरोज यादव सरु

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8 वर्ष पहले

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