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वो आखिरी मकान किसका है

                
                                                         
                            घर के सामने वाली सड़क पर,
                                                                 
                            
कुछ चार कदम चलते ही
बायीं तरफ़,
एक बंद गली से
ठंडी हवायें आती हैं,
उस गली में आखिरी मकान तक,
धूप नहीं जाती है।
तुम पूछो -
वो आखिरी मकान किसका है?

सुबह की धूप
जब बंद आँखों पर,
खिड़की से छन कर गिरती है,
तो उठ के बैठ जाता हूँ,
दायीं तरफ़,
कपड़ों की आलमारी में
कुछ पुराने कपड़ों के नीचे,
एक सामान छुपा रखा है।
तुम पूछो -
वो सामान किसका है?

कुछ सालों पहले
उस गली की आखिरी मकान पर,
जहाँ धूप नहीं जाती है,
एक चांद निकलता था,
उस चांद की रोशनी,
अक्सर इस कमरे तक आती थी,
बेतरतीब बिखरी किताबों के बीच
एक नीली डायरी है
उसके पन्नों पर जो चांदनी है,
वो उस चांद की है।
तुम पूछो -
वो चांद किसका है?

ये सामने जो बंद खिड़की है
कभी हर वक़्त खुली रहती थी,
अब जब कभी इसे खोलता हूँ,
सामने खुला आसमान होता है।
उस आसमान से,
तेज चिलचिलाती धूप
दौड़ते हुए आती है,
वो नीली डायरी के पन्नों की चाँदनी
की जगह लेना चाहती है।
बंद कर देता हूँ ये खिड़की,
और धूप से कहता हूँ,
उस गली में जो आखिरी मकान है,
वहाँ धूप नहीं जाती है…।
वो पूछता है -
वो आखिरी मकान किसका है?

संजीव सिंह


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6 वर्ष पहले

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