देश की आज़ादी तो सबने पाई,
मगर दौलत चंद लोगों के हिस्से आई।
जो दे गए जान आज़ादी की राह पर,
उन शहीदों के हिस्से,
बस गुरबत ही आई।
जिन्होंने चाटे थे तलवे फ़िरंगियों के,
रईसी बस उन्होंने विरासत में पाई।
जिनके लहू से ये धरती नहाई,
उनके घर में फिर भी तंगी ही आई।
जिन्होंने अपना कल देश पर लुटाया था,
उनके बच्चों ने मुफ़लिसी में बचपन बिताया था।
चाटुकारों को महल मिले, किसी को रोटी न आई,
किसी ने दौलत पाई, किसी ने उम्र गँवाई।
ये कैसी आज़ादी, ये कैसा हिसाब था,
जिसके लिए मिट गए,
उनके घर आज भी अभाव था।
देश की आज़ादी तो सबने पाई,
मगर शहीदों के हिस्से
बस कुर्बानी ही आई।
किसी ने तिरंगा शान से लहराया था,
किसी ने उसी तिरंगे में अपना कफ़न पाया था।
किसी के घर में जश्न की शहनाई बजी थी,
किसी माँ की आँखों में उम्रभर नमी रही थी।
हम पूछते हैं वक़्त से, ये कैसी रीत थी,
जिसने जान दी, उसके घर क्यों मुफ़लिसी थी?
देश की आज़ादी तो सबने पाई,
मगर शहीदों के हिस्से
भुखमरी ही आई।
-संजीव शर्मा ज़ख़्मी
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