फासले सिमटते ही धड़कनें ठहर सी गईं,
चाहतों का सिलसिला यूँ मुकम्मल हुआ,
प्यार का जब पैग़ाम जुबाँ पर आया,
और दम निकल गया॥
रास्तों में बिछा रखी थीं आँखें जिसकी,
हर एक आहट पर जिसको पुकारा था,
वो बे-रहम लौटकर घर आया,
और दम निकल गया॥
शिकवे तो बहुत थे हिसाब-ए-ज़िंदगी के मगर,
उसने जो एक बार सीने से लगाया,
सारा गिला-शिकवा वहीं छोड़ा,
और दम निकल गया॥
ज़िंदगी भर की वफ़ा का सिला यही मिला,
उसकी आँखों में जो अपना अक्स देखा,
दिल का हर एक अरमान दिल में ही रहा,
और दम निकल गया॥
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