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पढ़ न सकें अगर स्वयं इन्हें

                
                                                         
                            यह रेखाएं हाथों की,
                                                                 
                            
कह देतीं सब कुछ
जीवन का हर पहलू,
बक देतीं सब कुछ
रेखाएं ये खुली किताब,
सब कुछ लिखा है इनमें
पढ़ लो जीवन का हर लम्हा,
ऐ प्यारे तूं इनमें
झूठ नहीं सच-सच है कहतीं,
हाथों की रेखाएं
पढ़ न सकें अगर स्वयं इन्हें,
किसी ज्ञानी को दिखलाएं
ऊँच-नीच, सुख या दुख,
तुरंत दिखा देती रेखाएं
फैलोगे तुम कितना प्यारे,
भेद बता देती रेखाएं

––संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’
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एक घंटा पहले

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