कितना दर्द छुपा दुनिया में,
जीते हैं कैसे निर्धन,
करते हैं जी तोड़ परिश्रम,
फिर भी मिलता नहीं है धन।
महंगाई में कैसे कटती,
होगी उनकी यह दुर्दिन,
सोचूँ मैं कब जाएगा,
अपने हिस्से का दुर्दिन।।
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