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सब बेगाने, अपना कौन?

                
                                                         
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यही सोच कर काँपे दिल
सूने भवन, सूने हैं आँगन
हेलो हाय से गूंजे महफिल।

कदम-कदम पर छुपा यहाँ है
साधु-संत बना कातिल
धन-बल से सम्पन्न आज जो
समझे जाते वे ही काबिल।।

अपने गम अपने ही तक रख
ऐ हृदय ! ऐ मेरे दिल !!
–– संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’
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एक घंटा पहले

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