क्या सोचूं , क्या बोलूं मैं,
अपनों ने ठुकराया है ।
कभी ना गम होने दी जिनको,
उसी ने क्यों तड़पाया है ?
शिथिल शरीर, निस्तेज हुई आँखें
अजब बुढ़ापा आया है।
शायद कर्म खराब किए थे
रब ने याद दिलाया है।।
–– संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’
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