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माँगती भीख

                
                                                         
                            वह मांगती भीख।
                                                                 
                            
काशी के उस तंग गली में
गई मुझे वह दीख
वह मांगती भीख।।
पास न था उसके कोई भी ऐसा चीर
दूर कर सके ओढ़ जिसे
दुबले तन का पीर।
सिंदूरी चेहरा, वह चंद्र बदन
लंबी काया, थे झुके नयन
अपने में ही खोई
लगा मुझे– तब रोई, अब रोई।।

वह एक भुजी, एक टाँग अपंग
कुछ तन चिथड़ों से ढके हुए
कुछ वैसे ही थे नंग।
पार किशोरावस्था कर, यौवना
की तरफ बढ़े थे पाँव
चक्कर काट रही थी अब तो
सागर मध्य जीवन की नाव।
उस तंग गली के, आलीशान
बंगले के नीचे
बैठी उदास, भाग्य को कोसते
आँखों को मीचे।

गूंज रही थी मीठी तान, बंगले में–
जो थी ठीक सामने
सोचा मैं– ये कैसा अंतर बनाया
आखिर राम ने
इधर ये मांगती भीख
एक मात्र हाथ फैलाए,
सामने बंगले की मधुर तान से
हैं झंकृत दिशाएं।।

सर्दियों के दिन
छाया हुआ भयंकर कुहरा
मस्ती के आलम में बहता, जब–
हौले-हौले मस्त पवन
ठंड के मारे सिहर उठता, तब–
अच्छा खासा मेरा तन
कोट पहन स्वेटर के ऊपर
ओढ़ा था मैं मोटा कंबल
फिर भी उन हिममय झोंकों से
मच जाती तन में हलचल
पर, क्या समझ सकता कोई
लीला उस नटवर की
लेता है सुधि कैसे वह
थलचर, जलचर, नभचर की।

मखमली टोपी के नीचे,
मैने बाँधा था गुलबंद
उसपर भी खाने-पीने से
बॉडी मेरी थी बुलंद
कमी नहीं थी कपड़ों की
मेरे मोटे तन पर
असर छोड़ रहा था फिर भी
ठण्ड पवन मेरे मन पर।

थोड़े से चिथड़ों में लिपटी
वह अधनंगी बाला
सिमटी बैठी, पत्थर सी बनी
जैसे रणचण्डी ज्वाला।
कांप रही थी रह-रह कर वह
अजब प्रभु का खेल
डगर रही थी किसी तरह
जीवन की ‘गाड़ी रेल।’

पड़ी नजर ज्यों मेरे ऊपर
आँखें हुईं जब चार,
चेहरे का रंग बना तब ऐसा,
ज्यों दीन-हीन लाचार।
क्षण भर देख मुझे,
तब देखी उस बंगले की तरफ–
गूंज रही जिसमें झंकार।
वह विचित्र झंकार! वह मुग्ध झंकार!!

निकली तभी कुत्ते को साथ लिए–
बंगले की महारानी
अंग-अंग नग-जगमगत
शूट-बूट जापानी।
कुत्ता सीखा था अच्छी सीख।
वह मांगती भीख।।
सोलह श्रृंगार किये निकली, जब–
आलीशान बंगले के बाहर,
मखमली कपड़े में लिपटा श्वान
चला घूमने साथ शहर।

देखकर महारानी की तरफ, फिर–
कातर दृष्टि पड़ी मुझपर,
दृगों में छलक उठे तब अश्रु
ज्यों पत्थर पड़ गया हो दिल पर

तभी पूरे वेग से पुनः
बह चला वह ‘मस्त पवन’
एक बार को पुनः ठण्ड से
कांप गया था उसका तन।
दुनियां की बेहयाई देख,
तब कांप गया मेरा भी मन
नजरें झुकी, दांत कटकटाये, फिर–
दोहरी होकर सिमट गई।

सर्दी की कैसे सह रही पीर
नयना बन बह चले अधीर
निकल पड़ी फिर अंतरात्मा से
दर्द भरी एक चीख–
कोसते अपने भाग्य को फिर ज्यों कहा–
मैं मांगती भीख।।
– संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’
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5 घंटे पहले

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