ग्वाला भैया रोज मिलाते,
नीर क्षीर में क्यों ?
लेते हो जब पूरे दाम,
फिर बेमानी क्यों ?
अलग-अलग डब्बे में लाते,
देते जैसा जो
सबके पैसे एक समान,
फिर यह अंतर क्यों ?
–– संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’
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