आओ चले बैलगाड़ी पर चढ़कर
बेरोजगार हैं हम भी पढ़कर
गाड़ी वाले चले अकड़ कर
मरते कितने प्रतिदिन लड़कर।
इन बैलों की मस्तानी चाल
खुर के टॉप मिलाते ताल
गले घंटिका टुनटुन करती
जीवन में है खुशियां भरती।।
––संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’
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