चंद्र बदनि मज़्जनु करति, जल कर युगल उछारि।
कान्हा को निज बस करति, कोमल बदन उघारि।। 1
शीश अबोध झुकाइ के, गुरु को करो प्रणाम ।
बिनु गुरु कृपा मिले नहि, ईश्वर, अल्लाह, राम।। 2
खाकर सोवें चैन से, ये संसारी लोग।
जागें, रोवें रात को, लगा जिन्हें हाय रोग ।। 3
यह तन चंचल है। बहुत, बस में कर ले जोय।
नहिं उनको इस जगत में, कुछ भी दुर्लभ होय।। 4
यह तन दीपक मान कर, लहुणा तेल भरन्त ।
दिल बाती सुलगाइ कर, दीपक दई जलन्त।। 5
कोमल हिया जलाइ कर, खुशबू दई उड़न्त ।
आस लगी प्रिय कानि तक, पवन दई पहुंचन्त ।। 6
खुश्बू सूंघि समुझि पड़े, बीत गयो ये बसंत ।
दीप जलाऊं इधर मैं, उधर जलत मोर कन्त ।। 7
अपना हिरदै साफ है, हुआ सत्य का बोध ।
हरि हमको ढूंढत फिरें, कहत ‘अबोध-अबोध’।। 8
सारे रिश्ते धूल मिले, प्रेम भया अब शूल।
माँ-बाप की आज्ञा अब, लगाने लगे फिजूल।। 9
घर नहीं अब कमरे में, उठने लगी दीवार ।
कुटिल हुए मानव इतने, बिखर गया परिवार।। 10
अम्मा, माई, बाबूजी, मिले आज सब धूल ।
मम्मी, डैडी, पापा के, खिले सुनहरे फूल ।। 11
रुपए की इस दुनियां में, ऐसी चली बयार ।
करुणा अब दुर्बल हुआ, भूल गए सब प्यार।। 12
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