करते हुए प्रयास उन्हें पाया नहीं कोई
रस्ते पर रोक भी उन्हें पाया नहीं कोई
उन्हें उन्हीं की बात बता पाया नहीं कोई
काम उनका उनको सिखा पाया नहीं कोई
उनकी समझ को भी समझ पाया नहीं कोई
जाल में फँसने वाला बाहर आया नहीं कोई
उनकी अबूझ फितरत बूझ पाया नहीं कोई
कर देते कैसे हिकमत सूझ पाया नहीं कोई
उनके फिजा की शोहरत देख पाया नहीं कोई
उन्हें मिल ही जाए मुहूरत रोक पाया नहीं कोई
कब रहते हैं गंभीर जान पाया नहीं कोई
कब हँस दें हो अधीर भान पाया नहीं कोई
वो किसका भला चाहें हवा पाया नहीं कोई
जो दर्द उनसे मिलता दवा पाया नहीं कोई
उनका दूजा साया कभी पाया नहीं कोई
उनको तो आज तक हरा पाया नहीं कोई
कुछ किए बिना अनुभव वैसा पाया नहीं कोई
बेराज़ राज़ उनसा बना पाया नहीं कोई
वैसी रचना खुदा फिर से रच पाया नहीं कोई
आज तक कहीं उससे बच पाया नहीं कोई
-संदीप सिंह कुँवर
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