आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

करतब अनुसारी

                
                                                         
                            करेहुँ कर्म करतब अनुसारी, देखा नहिं जीत अरू हारी
                                                                 
                            
निज कांधे जो भार दिखावा, अति आतुर होइ ताहि निभावा
न सोचा किंचित निज स्वारथ, विधिहिं कृपा कीन्ह परमार्थ
एक के बाद एक सब पूरा, छूटा न तहाँ कोउ अधूरा
ज्येष्ठ पुत्र बन लड़ी लड़ाई, मात पिता हित पार लगाई
अब मोर कछु गिनती नाहीं, सबहिं कहत कुछ नहीं पाई
जेहिंकर जेतना सेवत जाई, वोहि से वतना विरोध पाई
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर