करेहुँ कर्म करतब अनुसारी, देखा नहिं जीत अरू हारी
निज कांधे जो भार दिखावा, अति आतुर होइ ताहि निभावा
न सोचा किंचित निज स्वारथ, विधिहिं कृपा कीन्ह परमार्थ
एक के बाद एक सब पूरा, छूटा न तहाँ कोउ अधूरा
ज्येष्ठ पुत्र बन लड़ी लड़ाई, मात पिता हित पार लगाई
अब मोर कछु गिनती नाहीं, सबहिं कहत कुछ नहीं पाई
जेहिंकर जेतना सेवत जाई, वोहि से वतना विरोध पाई
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X