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वो मेरी माँ थी..

                
                                                         
                            वो जलती रही,
                                                                 
                            
तपती रही
चूल्हे के सामने।

धुएँ से आँखें लाल हो गईं,
लेकिन खाना बनाने की फ़िक्र
ज़रा भी कम नहीं हुई।

बच्चा भूखा न रह जाए,
इसी सोच में
भोर में जाग जाती थी।

मैं अपने सुबह के स्कूल की
तैयारियों में लगा रहता था,
और वो...
भोर से ही जुट जाती थी
मेरे लिए।

न सर्दी की ठंडक देखी,
न ठंड से ठिठुरता बदन।

उन काँपती उँगलियों से
ठंडे पानी में बर्तन धोना,
सब्ज़ी बनाना,
खाना तैयार करना...

सिर्फ इसलिए,
कि बच्चा भूखा न रहे।

“थोड़ा खा ले,
और लेट न हो जाए स्कूल के लिए”—
यही सोचकर
न जाने कितना करती रही।

वो मेरी माँ थी।

आज सब सुख-सुविधाएँ हैं,
गैस है, इंडक्शन है,
हर काम आसान है।

लेकिन किसी में वो परवाह नहीं,
जो एक माँ में थी।

अब न बनाने के बहाने हज़ार हैं,
कभी बीमारी है,
कभी थकान है।

क्योंकि अब,
वो सब करने की ज़िम्मेदारी
माँ की नहीं रही।

आज समझ आता है—
वो सिर्फ़ खाना नहीं बनाती थी,

उसमें अपना पूरा प्यार मिलाकर
भोजन तैयार करती थी।
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एक घंटा पहले

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