मैं उन गलियों में
भटकता रहता हूँ इधर-उधर,
जहाँ तुम्हें दिख जाने की
दिल में चाह जगी रहती है।
उथल-पुथल-सी ज़िंदगी,
और मैं किसी अनजान मोड़ पर
तुम्हारी राह तकता,
एक उम्मीद लिए रहता हूँ।
याद है मुझे वो दिन,
जब ऐसे ही भटकते हुए
एक नज़र दिख गए तुम।
खुद को संभालते,
सादगी भरे भावों से,
कुछ पल रुककर
पायल को सही करना,
मेरी तरफ़ मुड़ना
और मुस्कुरा देना…
याद है मुझे।
शायद वही इंतज़ार
आज भी है,
जो मुझे इन गलियों में
भटकाता रहता है इधर-उधर,
जहाँ तुम्हें दिख जाने की
दिल में चाह जगी रहती है।
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