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मै, मेरी कलम और बातें

                
                                                         
                            आज मैं अपनी कलम से
                                                                 
                            
बातें कर रहा था,
तो कलम ने पूछा—
“आज किस पर लिखना है?”

मैंने कहा—
“पता नहीं...
बस आज कुछ लिखने का मन है।”

कलम मुस्कुराई,
बोली—
“चलो फिर,
किसी बीती याद पर लिखते हैं,
या उन रिश्तों पर
जिन्हें तुम अक्सर सोचते हो।”

मैंने कहा—
“नहीं...
आज कुछ नया लिखना है।”

कलम ने फिर पूछा—
“तो फिर सपनों पर लिखें?
उन बातों पर,
जो तुम किसी से कह नहीं पाते?”

मैंने फिर कहा—
“नहीं...
आज कुछ अलग लिखना है।”

कलम थोड़ी देर चुप रही,
फिर बोली—
“प्रेम पर लिखें?
या उस खामोशी पर
जो तुम्हारे भीतर बहुत कुछ कहती है?”

मैं मुस्कुराया और कहा—
“नहीं कलम,
आज इन सब पर नहीं...

आज मैं तुमसे पूछता हूँ,
क्या ऐसा कुछ है
जो हमने अब तक नहीं लिखा?”

कलम कुछ पल ठहरी,
फिर कागज़ पर उतरते हुए बोली—

“शायद आज
किसी विषय की जरूरत ही नहीं...

आज तुम
बस मुझसे बातें करो,
मैं शब्द बनती जाऊँगी,
और देखते-देखते
तुम्हारी बातें ही
एक नई कविता बन जाएँगी।”

मैंने कलम को देखा...
और लिख दिया—

“मैं अपनी कलम से
ये बातें कर रहा हूँ,
कि आज क्या नया लिखूँ...”

शायद
आज की कविता का विषय
यही है।
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2 घंटे पहले

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