न जाने क्यों,
गाँव की खुशबू
और अपने घर की महक
दिल से जाती ही नहीं...
शहर बदल गए,
ठिकाने बदल गए,
ज़िंदगी की राहें भी
कहाँ से कहाँ आ गईं...
मगर गाँव के वो पोखरे,
उसके किनारे वो मंदिर,
बड़ी-सी पानी की टंकी,
गेट के पास ट्रांसफॉर्मर,
अपने घर का वो आँगन,
आँगन में अमरूद का वो पेड़,
माँ की वो आवाज़,
और अपनों का वो साथ—
आज भी दिल वहीं ठहरा है।
न जाने क्यों,
जब भी थक जाता हूँ
इस भागती हुई ज़िंदगी से,
मन चुपके से
गाँव की ओर चल पड़ता है।
वो मिट्टी,
जिसमें कभी नंगे पाँव दौड़ा था,
वो छत,
जहाँ बैठकर आसमान निहारा था,
वो अपना गेट,
जहाँ से निकलते वक्त
कभी सोचा ही नहीं था
कि लौटने की इतनी चाह होगी...
शायद वो घर
सिर्फ चार दीवारों का नाम नहीं,
घर तो वो जगह है
जहाँ से दूर होकर भी
दिल कभी दूर नहीं हो पाता।
न जाने क्यों,
गाँव की खुशबू
और अपने घर की महक
दिल से जाती ही नहीं...
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