आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेरी कोई उम्मीद नहीं।

                
                                                         
                            सबको मुझसे उम्मीदें पर मेरी कोई उम्मीद नहीं।।
                                                                 
                            
सब जीते यां मुझसे लेकिन मेरी कोई जीत नहीं।।
झूठ कहूँ तो तौबा मेरी सच बोलूँ तो मैं मर जाऊँ,
सबके किस्से प्यार बने पर मेरी कोई रीत नहीं।।
हर चेहरे पर जान ना देना यां चाहे तन्हा रह लेना,,
हर चेहरे में इक चेहरा है पर मेरी कोई दीद नहीं।।
झूठो की दुनियाँ में यारों सच्चो का अब दाम नहीं,,
हाथ रखूँ तो सब कुछ मेरा मेरी कोई चीज़ नहीं।।
सबको अपनी पड़ी यहाँ पे कौन किसी को देखे है,
मेरी बातें अच्छी लगती पर मेरी कोई तनक़ीद नहीं
दो अंगुल का मुँह है लेकिन बात करे लंबी चौड़ी,,
आदत तो अच्छी लगती पर मेरी कोई मीत नहीं।।
रोने को तो रो लेते पर कोई सुने ना अब देखे देव,,
यादों की दुनियाँ अच्छी पर मेरी कोई चीज़ नहीं।।
-सुनील देव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर