आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

क्या क्या नहीं किया।

                
                                                         
                            अच्छा आया साल मेरा भी क्या क्या नहीं किया।।
                                                                 
                            
बस्ती छोड़ी गाँव भी छोड़ा क्या क्या नहीं किया।।
कदम कदम पर आँख मिचौली खेली है क़िस्मत,,
आंखों में रख उसकी सूरत क्या क्या नहीं किया।।
सागर जैसे लोग मिले पर प्यास बुझी ना दिल की,,
ख़्वाब गिरे ना पलकों से बस क्या क्या नहीं किया
वुज़ू किया रोज़ा भी रखा पर आया नहीं तू मिलने,
घर से अपने दूर थी मस्ज़िद क्या क्या नहीं किया।
जब सुनता है सबकी अल्लाह क्यूँ मेरी नहीं सुनी,,
मैने ए दिल तेरी ख़्वाहिश में क्या क्या नहीं किया।
जाते जाते साल भी मेरा बस खेल रहा है मुझसे,,
शुरू से लेकर अब तक मैने क्या क्या नहीं किया।।
मेरी भी कुछ सुन ले मौला साँस बची है कितनी,,
तुझे मनाने में हमनें देव यां क्या क्या नहीं किया।।
-सुनील देव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर