जब से तलाश में हूँ तेरी इस तेरे शहर में।।
ख़ुद को ही भूल बैठा हूं बस तेरे शहर में।।
रातों को जागता है क्यूँ हर आदमी यहाँ,,
सफ़र में ही दिख रहा है बस तेरे शहर में।।
हर इक गली में चाँद की परछाइयाँ दिखे,,
कुछ तो नया चल रहा है इस तेरे शहर में।।
हर्फो में हर्फ़ प्यार का बाकी सब वबा लगे,,
आंखों में चाँदनी है बस इस तेरे शहर में।।
मुझको मेरे नवाज़ तू इतना ही नवाज़ना,,
मिट्टी भी ये ठिकाने लगे बस तेरे शहर में।।
मिलना नहीं तो क्या हुआ आवारगी सही,,
पा के निशां ही मिलते रहे बस तेरे शहर में।।
कुछ ना सही तो इतना तो कर ही देना देव,,
जब तक रहूँ सफ़र में रहूं इस तेरे शहर में।।
-सुनील देव
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