आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ज़िंदगी में ग़म की बस हवाएं चलती रह गई।।

                
                                                         
                            ज़िंदगी में ग़म की बस हवाएं चलती रह गई।।
                                                                 
                            
याद के बिस्तर पे कुछ चिताएं जलती रह गई।।

वो शमां वो दौर ए उल्फ़त वो हाथ तेरा हाथ में,,
कहाँ गए वो रात दिन चिंताएं करती रह गई।।

कैसे गुज़ारा होगा अब ये सोचके चुप हो गया,,
आँख भी अश्क़ों से बस वफ़ाएंं करती रह गई।।

कोई अपना ही नहीं या कोई अपना था नहीं,,
सोचते ही सोचते बस कथाएं बनती रह गई।।

मुझसे अपनी ज़िंदगी का वास्ता कुछ यूँ रहा,,
जीते जी बस हाथ पर दवाएँ रखती रह गई।।

चार हर्फ़ों में कहाँ बयां कर पाए अपने दर्द को,,
जब तलक माँ साथ थी बलाएं चुनती रह गई।।

मौत जब लेने को आयी बस चले गए साथ देव,,
वो ना जाने किसके लिए नवाएँ करती रह गई।।
-सुनील देव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
19 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर