हमें भी आरज़ू थीं उस चमन की जो कहीं होता।।
के आंखों से उतरता और किस्सा ए ज़मीं होता।।
पुराने ख़्वाब जितने भी हैं अच्छे हैं मेरे लेकिन,,
कितना खूब होता गर तेरा दिल यहीं कहीं होता।।
वज़ह पूछो ना कोई हमसे अब बर्बाद होने की,,
के जीते रहते हम भी आज जो मिलना नहीं होता
सफ़र में हमसफ़र का हाथ हमेशा हाथ में होता,,
बिछड़ने की घड़ी में यार का गर ग़म नहीं होता।।
वुज़ू करने के यूँ तो आए होंगे लाखों पल लेकिन,,
अगर हम कर लिए होते तो आज ग़म नहीं होता।।
किसी चाहतों में खुद को गर अंज़ाम तक लाते,,
ना होती क़ब्रगाह कोई ना आज दिल ग़मी होता।।
चलो अच्छा हुआ के मिट गई सब दूरियां भी देव,
नहीं तो उम्र भर मिलने का हमको ग़म नहीं होता।।
-सुनील देव
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