बे तेग़-ओ-तुफंग, आतिश-ए-हक़ का वो मकाँ था
था फ़क़्र-ए-मुजस्सम, पे शहंशाह-ए-ज़माँ था
तोड़ा है ख़ुदी से जो तकब्बुर के सिनाँ को
ख़ामोश सदा से भी जो तूफ़ान-ए-जहाँ था
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