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मेरे घर से

                
                                                         
                            मौसम रूठा है मेरे घर से
                                                                 
                            

उम्मीदों की सब शाख़ें टूटी है मेरे घर से,
सावन भी बिना बरसे लौटा है मेरे घर से।

पतझड़ ने चुपके आकर पत्ते सभी गिराए,
हर फूल जाने क्योंकर रूठा है मेरे घर से।

सर्दी की रात लंबी, तन्हाइयाँ भी गहरी,
सूरज भी जाने क्योंकर रूठा है मेरे घर से।

बसंत आया तो भी खुशबू नहीं थी कोई,
हर रंग बेरुख़ी का गुज़रा है मेरे घर से।

बादल घिरे थे नभ पर, बरसे मगर न इक पल,
इक बूँद भी न बरसी क्यों रूठी है मेरे घर से।

रिश्तों की धूप माँगी, छाया भी कम मिली है,
अपनों का हर भरोसा टूटा है मेरे घर से।

मैंने लुटाईं खुशियाँ सबके ही हिस्से में तो,
फिर भी न जाने क्या-क्या छूटा है मेरे घर से।

अब किससे माँगूँ मौसम, किससे करूँ शिकायत,
हर बार मेरा मौसम रूठा है मेरे घर से।

विंध्य लाख चाहे, फिर भी न खिल सका मन,
लगता है जैसे मन भी रूठा है मेरे घर से।

 
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2 घंटे पहले

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