पथ की ऊंचाइयों पे चढ़ा ही था
उलझे से मन में कुछ बुना ही था
घर से जैसे निकला ही था
कदम दो कदम बड़ा ही था
के मौसम ने बदला रंग
हुआ हर तरफ जल तरंग
सभी मंजिल को अपनी अपनी दौड़े
मैं भी दौड़ा उन्हीं के संग
शाखो पे परिंदों का रेला था
नजर उठाया देखा जैसे मेला था
हर परिंदे के पंखों पर नमी थी
खाली थे पेट बस दानो की कमी थी
बारिशों की बूंदो के बाण
छन छन के आने लगे
सुखी बेजान पत्तियो के प्राण
धन धन के गाने लगे
तपती जमी पे
मुस्कुराहट की झलक थी
नया जीवन नई उम्मीद
की अलख थी
मौसम का देखा
ऐसा अनोखा रूप
बादल गरजे बरसे
निकली तेज धूप
प्रकृति का ऐसा व्यवहार
किसके लिए है
ये ना करती फर्क
ये सबके लिए है
-सचिन निगम
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