श्वेत कोट की ओट छुपा था, देखो कीचक काला,
पीड़ा हरने वाले गृह में, विष का फूटा प्याला।
कुरुक्षेत्र की पावन भू पर, कैसी रची कुचाली,
पंद्रह सावन की तनया की, छीन ली हर लाली।
द्वार बंद था, होश खो गया, साख वहाँ पर हारी,
मौन खड़ी थी अंध व्यवस्था, काँप उठी सुकुमारी।
अस्पताल की उस देहरी पर, धर्मराज सब सोए,
रक्षक ही जब भक्षक बन गए, सुता अकेले रोए।
पग-पग पर दुतकार मिली है, कैसा ये कुरुराया,
न्याय माँगने जब वह निकली, कोई पास न आया।
घायल काया को देख-देखकर, जग ने मुँह को मोड़ा,
उस निष्पाप विवश जीवन को, घोर अँधेरे में छोड़ा।
तड़प रही थी जो रातों में, छूट गया हर साया,
दोषी तो आज़ाद घूमता, जग ने उसे डराया।
अंधेर-नगरी के शासक सब, सत्य दबाकर बैठे,
मासूमों के सारे अधिकार, यहाँ पर लूटकर ऐंठे।
आँखों में आँसू की धारा, उर में गहरा घाव,
न्याय व्यवस्था के कमरों में, केवल शुष्क बहाव।
सहते-सहते हार गई जो, पूछ रही अधिकार,
टूट गया इस निष्ठुर जग में, उसका छोटा संसार।
मूक बने सब देख रहे हैं, शासन का ये ढोंग,
न्याय व्यवस्था सोई बैठी, खड़े हुए क्यों रोंग?
ज्वाला बनकर अब उठना है, खुद प्रतिशोध जगाओ,
मौन यहाँ अधिकार न देगा, रण की भेरी बजाओ।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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