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मेरे अल्फाज़

मेरा गांंव

Rishi Yadav

1 कविता

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दलदल था, जंगल था, और पीपल की छाँव थी
उब गया हूँ शहर में दोस्तों, इससे बढ़ियां गाँव था
वो पगडंडी की धूल, वो गेंदा का फूल
टाट पट्टी से सजा, वो प्यारा सा स्कूल
वहां नफरते नहीं शहर की, यहां बहन का प्यार र भाई का भाव था
ईससे बढ़िया मेरा........
वो अमरूद के बगीचे, वो आम के नीचे
लड़ झगड़कर छिप जाता मम्मी पापा के पीछे
शाम को मेरे चौबारे पर ठहर जाता हर पाँव था
इससे बढ़ियां..........
शादी में सब मिलजुलकर, सबका हाथ बंटाते थे
प्यार में सब साथ बैठकर खाते और खिलाते थे
जब सर पर हाथ फिराती मम्मा भर जाता हर घाव था
इससे बढ़ियां........
ना टीवी था ना अखबार था,खुशी हर परिवार था
जिंस वाली मेम नहीं. सर पर ऑचल का संस्कार था
पानी को पूछ लेते सब, जहां कहीं भी ठाव था
इससे बढ़ियां........
यहां फिक्र नहीं पड़ोसी की, वहां पूरा मुहल्ला अपना था
हर घर में रोटी मिलती थी, हर गोंद में सोता सपना था
गावों में मिलते हर दिल, यहां दिल में बस अलगाव है
इससे बढ़ियां......
By Yaduraj Rishi

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