जिम्मेदारियों का बोझ इतना था कि उठ ना सके हम
मेरा खुदा मेरे आंखों के सामने था पर झुक ना सके हम
मेरी परवरिश में संस्करों का एक ऐसा कतरा शामिल था
कि चाहकर भी घरवालों से कभी रूठ ना सके हम
By Yaduraj Rishi
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