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स्वर्ण मृग

                
                                                         
                            राम की पूजा, राम की सेवा,
                                                                 
                            
मन चाहें न अब, दूजा कोई मेवा,

प्राणों से प्रिय, प्रभु का चिंतन,
हो चिंता का चाहें जितना ख़ेवा,
राम की पूजा, राम की सेवा,
मन चाहें न अब, दूजा कोई मेवा।

एक दिन जल में मृग ने,
अदभुद अपना बिम्ब एक पाया,
सरिता को कर नमन उसने,
बोला, है प्रभु की अद्भुद ये माया,
देखा होता यदि सोने के मृग ने उस,
यूं छवि अपनी, वंश उसका तर जाता,
मिलते मृग उसके जैसे हर युग में,
न सृष्टि से छवि उसका खो पाता,

लाज रखी तूने हे राघव,
लांछन न लगने दी हमपे देवा,

राम की पूजा, राम की सेवा,
मन चाहें न अब, दूजा कोई मेवा।
– ऋषभ भट्ट
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10 महीने पहले

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