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राम आएं अवध को

                
                                                         
                            पग–पग पर दीप सजाओ चलो,
                                                                 
                            
राम आएं अवध को बुलाओ चलो,

चौदह वर्ष हुएं, अंखियां कण–कण की तरसी,
प्रीत बही बदल से, बिन प्रीतम बरखा सी बरसी,

हे त्रिपुरारी, अवध बिहारी, आओ आओ चरण पखारूं,
शब्द नहीं कि कुछ बोलूं, तुम सुन लो मैं हृदय से पुकारूं,

आज गोदी कौशल्या की खिल जाएगी,
कई गंगा भी संगम से मिल जाएंगी,
फूल महके त्रिभुवन में बिछाओ चलो,
पाप धुलने सभी साथ आओ चलो,

राम आएं अवध को बुलाओ चलो।

सुर ने छेड़ी तान न थी, कि मधुरस ही गाऊं मैं तो,
जैसे मिला आँचल मां का, तुमको पाकर इठलाऊँ मैं तो,

रात अमावस, लेकिन देखो चंदा–सूरज साथ उगे हैं,
तुम्हारे दर्श को हे रघुराई, बन सबरी ये नैन जगे हैं,

आज जैसे निवाला झलक का तेरी पाऊंगा,
लाख पीड़ा से पल भर में तर जाऊंगा,
व्रत तोड़ो हे! भोग लगाओ चलो,
पास अपने प्रभु को बिठाओ चलो,

राम आएं अवध को बुलाओ चलो।
- ऋषभ भट्ट
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 महीने पहले

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