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जितनी बार आँखें मूंदी

                
                                                         
                            पैरों की कोई बंदिशें ही नहीं इन सोच की,
                                                                 
                            
जिस ओर से गुजरा वहीं एक राह पाया,
आसमानी समंदर में शमां का धूप लाल आया,
जितनी बार आँखें मूंदी, उतनी बार तेरा ख्याल आया।

तूने सब्र रखा होगा ज़िंदगी में किसी के आने का,
मुझसे ही छूटा है तीर और मौका निशाने का,
तुम्हें देखता हूँ जब बाहों के किसी और के आज,
थम जाती है बोलने को एक लफ्ज भी आवाज़,

जवानी एकतरफे इश्क़ में गंवाकर शय खाई है,
मैंने सजाएं हैं सौ ख्वाब जिनमें न आकर भी तू आई है,
ये तुम बिन मेरे रात अकेले तो नहीं,
चांद है, तारें हैं, थोड़े गम भी सही,

कि हवा देने से बुझ जाएगी दिल में उठी हर आग,
बनी रहे तेरी मुस्कुराहट, बना रहे तेरा सुहाग,
मैं चल रहा हूँ छोड़ नाते इस जहां से,
उस पर कोहरे के किरदार जहां अपना सजाया,

आसमानी समंदर में शमां का धूप लाल आया,
जितनी बार आँखें मूंदी, उतनी बार तेरा ख्याल आया।

- ऋषभ भट्ट
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7 महीने पहले

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