आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कब आओगे हे प्राण प्रिय

                
                                                         
                            हे राम ! विनय पुकार करते हम
                                                                 
                            
कब आओगे निज धनुष लिए,
तुम्हारी राह देख-देख
गए दिन बीत चार,
आर्द्र नयन भी हो चले शुष्क
कब आओगे हे प्राण प्रिय || 1 ||

वैदेही सुधी लेने तुम
गए समुद्र सेतु बांध,
मै भी उस लंका में हूं
पर सागर हैं अदृश्य हज़ार,
राघव तेरी प्रतीक्षा में अब
प्रतिपल सहता पीड़ा हज़ार || 2 ||

मुझसे अनेकों पीड़ित यहाँ
राह निहारे तेरी राम,
रावण का यहाँ प्रत्यक्ष राज
हो खाए तिल-तिल रात मुझे,
छल कपट, विद्वेष नगरी यह
कब आओगे हे प्राण प्रिय || 3 ||

प्रतिक्षण हरण होता यहाँ
कभी अवसर का
कभी संभावनाओं का,
इतनी बेबस जनता का
चित्कार सुनो हे प्रियवर राम,
हमारी रक्षा हेतु प्रिय
आओ निज धनुष लिए || 4 ||
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर