हे राम ! विनय पुकार करते हम
कब आओगे निज धनुष लिए,
तुम्हारी राह देख-देख
गए दिन बीत चार,
आर्द्र नयन भी हो चले शुष्क
कब आओगे हे प्राण प्रिय || 1 ||
वैदेही सुधी लेने तुम
गए समुद्र सेतु बांध,
मै भी उस लंका में हूं
पर सागर हैं अदृश्य हज़ार,
राघव तेरी प्रतीक्षा में अब
प्रतिपल सहता पीड़ा हज़ार || 2 ||
मुझसे अनेकों पीड़ित यहाँ
राह निहारे तेरी राम,
रावण का यहाँ प्रत्यक्ष राज
हो खाए तिल-तिल रात मुझे,
छल कपट, विद्वेष नगरी यह
कब आओगे हे प्राण प्रिय || 3 ||
प्रतिक्षण हरण होता यहाँ
कभी अवसर का
कभी संभावनाओं का,
इतनी बेबस जनता का
चित्कार सुनो हे प्रियवर राम,
हमारी रक्षा हेतु प्रिय
आओ निज धनुष लिए || 4 ||
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