छोड़ उम्मीदें मर जायेंगे, हम रोकर भी क्या पायेंगे।
होंठ भी सूखे सूखे हो गए,अब हंसकर भी क्या पायेंगे।
गर नदियों में पानी न होगा, तो नदियां, नदियां न होंगी।
फ़िर सूखी नदियों में बहकर,रहकर भी हम क्या पायेंगे।
रात अंधेरी उलझी है, राह दिखे न साथ दिखे।
चारों ओर अंधेरा है फिर, जुगनू बनकर भी क्या पायेंगे।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X