चले वन में सिया लखन रघुवीर,
राम-लखन सह लिए कमान तीर।
चलते चलते बीच राह
में उनको लगी प्यास,
कोई सरिता-सर-सिंधु
दिखा नहीं उनके पास।
घनघोर घटा छाया अंबर में
कमंडल नहीं था किसी के कर में।
बरसा नहीं मेघ चला दिशि ओर
रघुवर को दिखा एक मोर।
गए मोर समक्ष राम,
मोर मन ही मन किया प्रणाम
दिए राघो आशीर्वचन
मोर हो गया प्रसन्न
राम कहे "मैं हूॅं प्यासा
जल मिलने की न हैं आशा।"
ध्यान धर कहा मोर
"उस ओर तो है सरिता
जहाॅं सभी हैं जल पीता!"
आइए मेरे पीछे पीछे नाथ
पा मेरा संकेत स्मरण साथ
मोर गिराते चला रंगीले पर
राम सह दोनों चले डगर
आ गया सरिता पास
मोर के जीवन से छूटने लगा आस।
गिरा गिरा करके निज पर
गया राह दिखा, तत्क्षण मर।
तीनों प्राणी को हुआ पीड़ा अपार
दिखा गया वह जीवन की धार।
रघुवर के विशाल उर
बोले "हे महान मयूर
मैं द्वितीय जन्म में रखुंगा तेरा लाज
तेरे पंख बिन सुना होगा मेरा ताज।"
मयूर को दे अंतिम विदाई
जल पी सभी ने प्यास बुझाई।
नव तिलक नव चंदन
नव ताल नव अभिनंदन
नव प्रेम नव कर्म
नव लीला नव धर्म
समर-सीमा- संग्राम
राम को मेरा प्रणाम।
युग कंपित, गिर गया काल
टुट गया प्रकृति का विविध जाल।
हुआ हरि का कृष्ण अवतार
मयूर का युगों से पुकार।
केशव लगाए मोर पंख केश ताज
बढ़ा मुकूट का कांति सुसज्जित साज।
अति अनमोल मधु अधर
श्याम शरीर बांसुरी कर
पितांबर के प्यारे लोचन
वपु पर सज्जित कंचन
तेरी लीला तेरा ज्ञान
तेरी आभा तेरा सम्मान
शाश्वत कथा, प्रेम परम
अगणित तेज शून्य तम
नवल रस रंगीले-पर-भाल
हे पुरूष विभ्राट् विशाल
अनंत कार्य अनादि नाम
मेरा नत-नयन-मन-शिखर
करता अनंत कोटि प्रणाम।
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