शून्य, जीवन और व्हिस्की
शून्य की गोद में जन्मा जीवन,
एक अनंत रिक्तता से उठती लहर,
जहाँ मौन है, वहाँ धड़कन भी है,
जहाँ खालीपन है, वहीं अर्थ की खोज।
जीवन—एक अधूरी किताब,
पन्नों पर बिखरे अक्षर,
कुछ स्पष्ट, कुछ धुंधले,
कुछ जैसे धुएँ में घुलते हुए।
व्हिस्की की बूंदें—
जैसे समय का स्वाद,
कभी कड़वा, कभी मधुर,
कभी जलती हुई आग का स्पर्श।
शून्य कहता है:
"मैं ही शुरुआत हूँ, मैं ही अंत,"
जीवन उत्तर देता है:
"मैं ही यात्रा हूँ, मैं ही प्रश्न।"
व्हिस्की हँसती है:
"मैं वह विराम हूँ,
जहाँ तुम भूल जाते हो
कि प्रश्न भी कभी भारी थे।"
काँच के गिलास में
घूमती सुनहरी लहरें,
जैसे ब्रह्मांड का रहस्य
एक छोटे वृत्त में कैद हो।
जीवन की थकान
व्हिस्की में घुलकर
क्षण भर को हल्की हो जाती है,
पर शून्य फिर याद दिलाता है—
"सब कुछ अस्थायी है,
तुम्हारी हँसी भी, तुम्हारा दर्द भी।"
और इस त्रिकोण में—
शून्य, जीवन और व्हिस्की,
हम सब एक नृत्य करते हैं,
कभी मौन, कभी मदहोश,
कभी बस प्रतीक्षा में।
शून्य की गहराई में
जीवन की चिंगारी जलती है,
व्हिस्की उस चिंगारी को
धुएँ में बदल देती है,
और हम सोचते हैं—
क्या यह सब एक खेल है?
या एक अनंत कविता,
जिसे कोई कभी पूरा नहीं लिख पाएगा।
`
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