जब-जब आते,
खुद को ज़्यादा महसूस करता,
खुद के थोड़ा और क़रीब पाता।
अकेला जब-जब होता,
इनको ख़ुद के पास पाता।
दर्द-ए-दिल को समझते,
टूटे हुए हिस्सों को फिर
धीरे-धीरे जोड़ते।
दिल के हर ग़म को
पिघलाते हैं ये—
और ख़ामोशी में
बहुत कुछ कह जाते हैं।
ये जब-जब आते हैं,
मैं ख़ुद से
मिलने लगता हूँ।
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