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खुद के थोड़ा और क़रीब पाता।

                
                                                         
                            जब-जब आते,
                                                                 
                            
खुद को ज़्यादा महसूस करता,
खुद के थोड़ा और क़रीब पाता।

अकेला जब-जब होता,
इनको ख़ुद के पास पाता।

दर्द-ए-दिल को समझते,
टूटे हुए हिस्सों को फिर
धीरे-धीरे जोड़ते।

दिल के हर ग़म को
पिघलाते हैं ये—
और ख़ामोशी में
बहुत कुछ कह जाते हैं।

ये जब-जब आते हैं,
मैं ख़ुद से
मिलने लगता हूँ।
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32 मिनट पहले

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