कभी यूं हुआ करता था....
कभी थी बेपनाह सी मोहब्बत तुमसे।
कभी दिल तुम्हारे बिना लगता नहीं था।
कभी यूं हुआ करता था।
हर रोज रहता था उस शाम का इंतजार
और उस सुबह का,
जब पूरब में निकलते सूरज को
और पश्चिम में झील के किनारे बादलों की आगोश में
समाते देखा करते थे।
कभी यूं हुआ करता था।
कहते थे बेझिझक सारी बातें हमसे और हम तुमसे कहा करते थे।
कभी यूं ही लिखे खत तुम्हारे
किताबों में महका करते थे,
जब रहूं तन्हा कुछ बातें करते थे।
कभी यूं हुआ करता था।
वो चांद हर रोज बैठकर सिरहाने मिरे कहता था,
संदेश तुम्हारे फिर हम ढले
रात पैगाम तुम्हें भिजवाते थे हमारा।
बस इक झलक देख लेते तुम मुझे, मैं देख लेती थी तुम्हें।
बस कुछ अलग सा रिश्ता था हमारा।
कभी यूं हुआ करता था।रजनी पांडेय
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