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मी टू सैलाब

                
                                                         
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मी टू
ले आया
रज़ामंदी
दोगलापन
बीमार ज़ेहन
मंज़र-ए-आम पे !


वो
मर्द
मासूम
कैसे होगा
छीनता हक़
कुचलता रूह
दफ़्नकर ज़मीर !


क्यों
इश्क़
रोमांस
बदनाम
मी टू सैलाब
लाया है लगाम
ज़बरदस्ती को "न"



मानो
सामान
औरत को
रूह से रूह
करो महसूस
है ज़ाती दिलचस्पी।


है
चढ़ी
सभ्यता
दो सीढ़ियां
दिल है ख़ाली
तिजोरियां भरीं
भौतिकता है हावी।

हो
तुम
बौड़म
मानते हो
होंठों पर न
स्त्री के दिल में हाँ
बे-बुनियाद सोच।

- रवीन्द्र सिंह यादव

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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