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बादल आवारा

BAADAL  AAVARA
                
                                                         
                            आवारा बादल हूँ मैं
                                                                 
                            
अपने झुंड से बिछड़ गया हूँ मैं
भटकन निरुद्देश्य न हो
इस उलझन में सिमट गया हूँ मैं।

सूरज की तपिश से बना हूँ मैं
धनात्मक हूँ या ऋणात्मक हूँ मैं
इस ज्ञान से अनभिज्ञ हूँ मैं
बादलों के ध्रुवीकरण
और टकराव की नियति से छिटक गया हूँ मैं
बिजली और गड़गड़ाहट से बिदक गया हूँ मैं।

सीमेंट-सरिया के जंगल से दूर
उस बस्ती में बरसना चाहता हूँ मैं
जहाँ....

जल की आस में
दीनू का खेत सूखा है
रोटी के इंतज़ार में
नन्हीं मुनिया का पेट भूखा है
लहलहाती फ़सलों को
निहारने सुखिया की आँखें पथराई हैं
सीमा पर डटे पिया की बाट जोहती
सजनी की निग़ाहें उदास दर्पण से टकराई हैं
गलियों में बहते मटमैले पानी में
बचपन छप-छप करने को आकुल है
अल्हड़ गोरी हमउम्र सखियों संग
झूले पर गीत गाने को व्याकुल है।

माटी की भीनीं-सौंधी गंध
हवा में बिखर जायेगी
हरियाली की चादर ओढ़
पुलकित बसुधा लजायेगी
नफ़रत बहेगी नदी-नालों में
सद्भाव उगेंगे ख़्यालों में

उगे हैं बंध्या धरती पर शूल जहाँ
पुष्पित होंगे रंग-बिरंगे फूल वहाँ
सूखे कंठ जब तर-ब-तर होंगे
अनंत आशीष मेरे सर होंगे।

यह दृश्य देख
बादल होने पर इतराऊँगा
काल-चक्र ने चाहा तो
फिर बरसने आऊँगा........!!!

रवीन्द्र सिंह यादव

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8 वर्ष पहले

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