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यकीन करने से पहले, सच को परख भी लेना

                
                                                         
                            सितारों भरी वो रात बर्फ़-सी जमी हुई क्यों है,
                                                                 
                            
ख़ामोश आसमान में ये उदासी-सी क्यों है,
दूर से लगा कि ठंड ने हर शय को जमा दिया,
पास जाकर देखा तो लगा, कोई गर्मी भी वहीं है।

जब ग़ौर से देखा तो धुआँ-सा उठने लगा,
जमी हुई ख़ामोशी से भाप का रिश्ता जुड़ने लगा,
जिस बात पर निगाहों को यक़ीन होता न था,
हक़ीक़त का पर्दा धीरे-धीरे खुलने लगा।

हर चमकती चीज़ को सच मान लेना ठीक नहीं,
हर ख़ामोश मंज़र का मतलब ग़मगीन नहीं,
जो दूर से दिखाई दे, ज़रूरी नहीं वही सच हो,
बिना परखे किसी नतीजे पर पहुँचना यक़ीन नहीं।

कभी ठहरकर देखो, नज़ारे बदल भी जाते हैं,
ग़ौर करने से कई राज़ खुल भी जाते हैं,
जो आँखों ने पहली नज़र में नकार दिया था,
वही सच तजुर्बे की रोशनी में नज़र आते हैं।

इसलिए हर बात पर फ़ौरन, फ़ैसला न करना,
बिना समझे किसी हक़ीक़त को, झुठला न देना,
नज़र से आगे बढ़कर, तजुर्बे तक पहुँचना,
यक़ीन करने से पहले, सच को परख भी लेना।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 घंटे पहले

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