अजीब ख़ौफ़ है अब इस क़दर उलफ़त में,
कहीं मुकम्मल न हो जाए दास्ताँ मेरी।
वो दूर हैं तो हर इक ख़्वाब हसीं लगता है,
कहीं क़रीब न आ जाएँ, तो क्या होगा मेरा।
ये कैसी चाहत है, कैसी अजीब सी उलझन है,
उन्हें बुलाना भी है, और बचानी है तिश्नगी मेरी।
कभी तो आएँ वो ख़्वाबों की तरह रातों में,
मगर सहर में न हो जाए रुसवाई मेरी,
हमें तो उम्र गुज़ारनी है इसी ख़ुशफ़हमी में,
कि उनके इंतिज़ार में ही है ज़िंदगी मेरी।
-रतन कुमार कैथवास
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